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कहानी एक जिंदगी की
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कहानी एक जिंदगी की 25अगस्त24©नरेंद्र कुछ रहम कर जिंदगी थोड़ा तो संवर जाने दे, तेरा अगला ज़ख्म भी सहूंगा पहले वाला तो भर जाने दे। कभी कोई शिकायत नही की तेरे किए हुए सितम से, तेरा कोई भरोसा नही मुझे आज तो थोड़ा मुझे जीने दे। ख़ुशी के साथ तूने ग़म भी दिए तेरे कितने अफ़साने है, खेल ये तक़दीर या तक़रीर का है जरा इसे तो समझने दे। दोबारा कहा मुलाकात होगी! तेरी और मेरी इस कायनात में, नफ़रत से भरी इस दुनियां में प्यार के कुछ पल चख लेने दे। तू कभी आशा है,तो कभी निराशा कभी आग है तो, कभी पानी, सभी की एक ही कहानी है आज जरा मेरी कहानी तो सुनाने दे। कवी:डॉ. नरेंद्र गाडगे सहयोगी प्राध्यापक, नागपूर